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हज़रत मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी (अल्लाह उन पर रहम करे) की याद में एक इज्ज़तदार शोक सभा रखी गई

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*मदरसा चश्मे फैज़ मलमल* (दारुल उलूम नदवत उलेमा लखनऊ की ब्रांच) *

हज़रत मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी (अल्लाह उन पर रहम करे) की याद में एक इज्ज़तदार शोक सभा रखी गई* मौलाना फतेह इकबाल नदवी व कासमी

मधुबनी संवाददाता मो सालिम आजाद

अल्लाह तआला की कृपा और रहम से, सम्मानित शिक्षक *हज़रत मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी* (दारुल उलूम नदवत उलेमा, लखनऊ की ब्रांच) की याद में एक बहुत ही इज्ज़तदार, रूहानी और ज्ञानी शोक सभा रखी गई, जिसमें बड़ी संख्या में विद्वानों, शिक्षकों, छात्रों और ज्ञान के लोगों ने भाग लिया पूरी सभा में दुख, प्यार, भक्ति और वफ़ादारी का ऐसा माहौल था कि मौजूद लोगों के दिल दिवंगत की याद से भर गए
सत्र की शुरुआत पवित्र कुरान और पवित्र पैगंबर की नात के पाठ से हुई, जिसके बाद मदरसे के अरबी साहित्य के शिक्षक *मौलाना अनबसात आलम साहिब नदवी* ने बहुत ही विनम्र, प्रभावी और साहित्यिक तरीके से परिचयात्मक भाषण दिया, उन्होंने मॉडरेटर के कर्तव्यों का पालन किया इस अवसर पर, *मौलाना जिया-उल-हक साहिब नदवी* ने हज़रत मौलाना की विद्वता, अध्ययन की विशालता, हदीस और तफ़सीर के विज्ञान में गहरी अंतर्दृष्टि और अनुसंधान सेवाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मृतक को अपने युग के प्रमुख विद्वानों में से एक माना जाता था और उनकी विद्वतापूर्ण सभाएं हमेशा विद्वानों के लिए गर्व का स्रोत बनी रहेंगी ग्रेट इंडिया अकादमी के कार्यकारी निदेशक, *श्री नज्म-उल-हुदा सही साहिब* ने अपने भाषण में कहा कि हज़रत मौलाना की नज़र न केवल भारतीय और उपमहाद्वीपों पर थी, बल्कि अरब दुनिया और मध्य पूर्व की स्थितियों पर भी थी उम्मत की सामूहिक परेशानियाँ उनके दिल का दर्द थीं, और वे बिना किसी ज़रूरत के, पूरी हिम्मत और ईमानदारी के साथ सच को बयां करते थे उनकी सच्चाई, दूर की सोच और उम्मत का दर्द हमेशा उनकी पर्सनैलिटी की खासियत रही है और उनकी यही हिम्मत कुछ हलकों में आलोचना और विरोध का कारण भी बनी लेकिन वे हमेशा सच के लिए खड़े रहे और सच को नकारा वे अपनी ज़िंदगी के आखिर तक झूठ के रास्ते पर डटे रहे बाद में, मदरसा चश्मा फैज़ के बेहतरीन उस्ताद, *मुफ़्ती मुबारक साहिब कासमी* ने हज़रत मौलाना (अल्लाह उन पर रहम करे) की इल्मियत को सलाम करते हुए कहा कि वे इल्म और मेहरबानी की एक चमकती हुई रोशनी थे उनकी वाक्पटुता, दिलकश वक्तृता और दिल को छू लेने वाले अंदाज़ ने उन्हें विद्वानों के बीच एक खास जगह दी इल्म की गहराई और गहराई और उनके बयान की खूबसूरती उनकी पर्सनैलिटी की ऐसी खासियतें थीं जिनकी रोशनी लंबे समय तक विद्वानों के रास्तों को रोशन करती रहेगी वहीं *मौलाना ज़ाहिद वसी साहिब नदवी* ने अपने भाषण में कहा कि अपनी विद्वत्तापूर्ण स्थिति को मानना ​​ईमानदारी का तकाज़ा है उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कुछ विद्वत्तापूर्ण राय से असहमति की जगह है लेकिन इस आधार पर सोशल मीडिया पर किसी गुज़र चुके व्यक्ति को टारगेट करना इस्लामी नैतिकता के ख़िलाफ़ है उन्होंने आगे कहा कि बंदों की किस्मत का फ़ैसला करना हमारा काम नहीं है बल्कि यह अल्लाह तआला का अधिकार है; इसलिए असहमति में भी संयम तहज़ीब और अच्छी नीयत रखनी चाहिए, और गुज़र चुके व्यक्ति का मामला अल्लाह तआला के दरबार में छोड़ देना ही ईमान वालों का तरीका है हज़रत मुफ्ती सलीमुद्दीन साहिब कासिमी, हदीस के शेख, फातिमा ज़हरा विश्वविद्यालय और मदरसा चश्मा फैज़ मलमल के शिक्षक, ने अपने भाषण में, पवित्र कुरान की आयत की रोशनी में नदवी (अल्लाह उन पर रहम करे) की शैक्षणिक सेवाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने आपसी भाईचारे, सद्भावना और व्यापक सोच को इस्लामी समाज के बुनियादी मूल्यों के रूप में घोषित किया। बाद में मौलाना और कारी ग़ज़ाली साहिब नदवी ने अपने भाषण में हज़रत मौलाना के ज्ञान की चौड़ाई और शैक्षणिक अखंडता पर प्रकाश डाला और कहा कि दिवंगत विद्वान ने हमेशा विद्वानों को सोशल मीडिया के शोर और कोलाहल के बजाय सीधे संवाद और उनके साथ बहस करने की कुरानिक शैली अपनाने के लिए आमंत्रित किया अगर कोई मतभेद था लेकिन उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया कि जो मतभेद ज्ञान और अच्छी बातचीत के ज़रिए सुलझाए जा सकते थे वे सोशल मीडिया की कड़वाहट की बलि चढ़ गए हालांकि पढ़ाई-लिखाई की परंपरा की खूबसूरती हमेशा सबूत, समझदारी और असहमति के साहित्य में रही है। *मदरसा चश्मा फ़ैज़ मलमल के प्रमुख मौलाना फ़तेह इक़बाल नदवी और कासिमी* अपने भाषण में हज़रत मौलाना (अल्लाह उन पर रहम करे) की प्यारी पर्सनैलिटी, स्टूडेंट-सेंटर्ड सोच और ज़बरदस्त पॉपुलैरिटी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि स्टूडेंट्स उनसे बहुत प्यार करते थे और उनके जमावड़ों को अपनी खुशी मानते थे उन्होंने कहा कि हज़रत मौलाना ने पढ़ाने-लिखाने को सिर्फ़ किताबों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि कल्चरल और लिटरेरी एक्टिविटी, कॉम्पिटिशन और हर तरह के ट्रेनिंग प्रोग्राम के ज़रिए स्टूडेंट्स की काबिलियत को बेहतर बनाने का एक कामयाब रिवाज़ शुरू किया उन्होंने अफ़सोस जताया कि उनकी ज़बरदस्त काबिलियत, पॉपुलैरिटी और लोगों में उनकी पहचान कुछ हलकों और यहां तक ​​कि उनके अपने लोगों के लिए भी जलन की वजह बन गई। हालांकि, ये विरोध भी उनके पक्के इरादे और लगन को हिला नहीं सके आखिर में इस मदरसे के एजुकेशन डायरेक्टर *मौलाना मोइन अहमद साहिब नदवी* ने अपनी आखिरी बात में हज़रत मौलाना की दिलेर सच्चाई को उनकी पर्सनैलिटी की एक खासियत बताया और कहा कि वे अक्सर यह शेर पढ़ते थे: कहता हूं वही बात समझता हूं जिसे हक़ में ज़हर बला बल को कभी कह न सका कनद उन्होंने कहा कि यह शैर हजार मौलाना की पुरी ज़िन्दगी की तरजुमानी है इस मौक़ा पर उन्होंने अईयाम तालिब इल्मी की चन्द यादें भी ताजा किं आखिर में हज़रत मौलाना के लिए रक्त आमेज दोआएं मगफिरत की गई और उसी दोआ के साथ यह पुर वकार ताजिअती निशसत को अबुल फरमाएं और मरहुम की कामिल मगफिरत फरमाएं आमिना या रब्बुल आलामीन

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