पसमांदा मुस्लिमों की बैठकें जरूरी, तभी मिलेगा हक – आल इंडिया जमीअतुर राईन
मधुबनी, संवाददाता: मो. सलीम आजाद
पसमांदा अकलियती समाज पर सवाल उठाना और पिछड़े समाज की राईन, अंसारी व अन्य जातियों को मुख्यधारा से बाहर रखना पुरानी सामंती चाल है। इसका इलाज सिर्फ जागरूकता है।
आल इंडिया जमीअतुर राईन के राष्ट्रीय महासचिव संगठन डॉ. राहत अली राईन ने कहा कि यादव, भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, कुर्मी, कुशवाहा, पासवान और सहनी जैसी प्रभावशाली जातियां बिहार-यूपी भर में अपने समाज की बैठकें कर रही हैं। ये सभी समाज शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उत्थान के लिए एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं। इससे उन्हें राजनीतिक लाभ भी मिल रहा है।
डॉ. राईन ने कहा कि जिन जातियों के हाथ में हमेशा से सत्ता की चाबी रही है वो सामाजिक और आर्थिक रूप से भी मजबूत हैं। लेकिन बिहार के जो 40 प्रतिशत अति पिछड़े और पसमांदा मुस्लिम समाज की राईन, कुंजड़ा, दफाली, रंगरेज, कुरैशी, मोमिन, मीरशिकार, अंसारी, बक्खो जैसी जातियां हैं, वो आज भी हाशिए पर हैं।
उन्होंने कहा कि पसमांदा समाज में न तो लगातार बैठकें हो रही हैं और न ही अशराफ समाज ने कभी उनके हक की आवाज बुलंद की। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी साफ लिखा है कि मुस्लिमों की स्थिति दलितों से भी बदतर है। अल्पसंख्यकों के नाम पर खुले स्कूल-कॉलेजों में भी पसमांदा समाज की शिक्षा नगण्य है।
डॉ. राईन ने कहा कि पसमांदा समाज में संकोच और डर के कारण नेतृत्व सामने नहीं आ पाता। जरूरत है कि समाज के बीच चर्चा-विमर्श हो ताकि लोग हिम्मत और रणनीति के साथ शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के लिए एकजुट हों।
उन्होंने कहा कि जागरूकता केवल अपने समाज तक सीमित न रहे। किसी दूसरे समाज के प्रति नफरत न फैले। महात्मा गांधी, डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, कर्पूरी ठाकुर, जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों के विचारों का प्रशिक्षण दिया जाए। हर व्यक्ति को अपने घर, गांव और समाज के उत्थान के लिए काम करना चाहिए।
