मुहर्रम: ग़म, तारीख़ और तालीम का पैग़ाम
तहरीर: इरफान जामियावाला
मुहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना है। अक्सर हमारे समाज में इसकी पहचान सिर्फ़ ताज़िया, मातम, जुलूस और रस्मों तक महदूद होकर रह गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मुहर्रम का पैग़ाम सिर्फ़ यही है, या इसके पीछे कोई ऐसा फ़िक्र भी है जो हमारी ज़िंदगी और समाज को बदल सकता है?
सन 61 हिजरी में इमाम हुसैन इब्न अली और उनके 72 साथियों ने कर्बला की सरज़मीन पर ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और जब्र के ख़िलाफ़ अपनी जान कुर्बान कर दी। यह जंग हुकूमत हासिल करने की नहीं, बल्कि इंसाफ़, सच्चाई और इंसानी गरिमा की थी। इसी वजह से मुहर्रम को दुनिया भर में एक अज़ीम तारीखी व रूहानी वाक़िया माना जाता है।
आज दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में मुहर्रम अलग अंदाज़ में मनाया जाता है। शिया मुसलमान इसे ग़म और अज़ादारी के तौर पर मनाते हैं, जबकि बहुत से सुन्नी मुसलमान भी इमाम हुसैन की कुर्बानी को अकीदत से याद करते हैं। इसलिए मुहर्रम को सिर्फ़ किसी एक फ़िर्क़े का त्योहार कहना तारीखी और दीनी तौर पर मुकम्मल तस्वीर पेश नहीं करता।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम यह सोचें कि अगर इमाम हुसैन ज़ुल्म के सामने झुकने के बजाय इल्म, अख़लाक़ और इंसाफ़ का पैग़ाम देकर गए, तो क्या हम उनकी याद को सिर्फ़ रस्मों तक महदूद कर दें?
हमारे समाज की कई पिछड़ी बिरादरियाँ—जुलाहा (अंसारी), धुनिया, दर्ज़ी, धोबी, हज्जाम और दूसरी मेहनतकश कौमें—आज भी तालीम, रोज़गार और मआशी तरक़्क़ी के मैदान में पीछे हैं। मुहर्रम के मौक़े पर लाखों रुपये रस्मों और जुलूसों पर खर्च होते हैं, लेकिन अगर इसी जज़्बे का एक हिस्सा बच्चों की तालीम, लाइब्रेरी, स्कॉलरशिप, कोचिंग सेंटर और हुनरमंदी पर लगाया जाए, तो आने वाली नस्लों की तक़दीर बदल सकती है।
अक्सर लोग ईरान और सऊदी अरब की मिसाल देते हैं। हक़ीक़त यह है कि दोनों मुल्कों ने अलग-अलग दौर में तालीम, साइंस, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर और अपनी सियासी व मआशी नीतियों के ज़रिये तरक़्क़ी की है। किसी भी मुल्क की ताक़त सिर्फ़ मज़हबी रस्मों से नहीं, बल्कि इल्म, रिसर्च, टेक्नोलॉजी, मज़बूत इदारे और इंसानी सरमाये से बनती है।
इसलिए किसी फ़िर्क़े या मुल्क को कमतर या बेहतर साबित करने के बजाय हमें अपने समाज की इस्लाह पर ध्यान देना चाहिए।
अगर इमाम हुसैन की कुर्बानी से कोई सबसे बड़ा सबक़ मिलता है, तो वह यह है कि इंसान ज़ुल्म के सामने न झुके, सच का साथ दे और अपनी आने वाली नस्लों को इल्म से रोशन करे।
आज अगर मुहर्रम के मौक़े पर हर मोहल्ला एक लाइब्रेरी क़ायम करे, हर अंजुमन दस ग़रीब बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी ले, हर ताज़िया कमेटी एक स्कॉलरशिप फ़ंड बनाए, तो शायद यही इमाम हुसैन की कुर्बानी का सबसे बड़ा अमली ख़िराज-ए-अक़ीदत होगा।
याद रखिए
“ताज़िया एक दिन का होता है, लेकिन तालीम पूरी नस्ल की ज़िंदगी बदल देती है।”
इमाम हुसैन ने हमें सिर्फ़ रोना नहीं सिखाया, बल्कि ज़ालिम के सामने डटकर खड़ा होना, इल्म हासिल करना और इंसाफ़ की राह पर चलना भी सिखाया।
इरफान जामियावाला
