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पसमांदा समाज अब सिर्फ वोट बैंक नहीं: इरफान जामियावाला ने की हिस्सेदारी की मांग

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पसमांदा समाज अब सिर्फ वोट बैंक नहीं: इरफान जामियावाला ने की हिस्सेदारी की मांग

 

लखनऊ: ओबीसी नेता, समाजसेवक, लेखक और निर्देशक इरफान जामियावाला तथा आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम इत्तेहाद ने समाज से अपील करते हुए उत्तर प्रदेश की राजनीतिक वास्तविकता पर ध्यान देने का आग्रह किया है।

इरफान जामियावाला ने कहा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय और सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है। प्रदेश में पिछड़ा वर्ग, दलित और पसमांदा मुसलमान मिलकर चुनावी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत हैं। यदि ये वर्ग अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को प्राथमिकता दें तो प्रदेश की सत्ता का समीकरण बदल सकता है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता लगभग 21 प्रतिशत हैं। इनमें जाटव समुदाय का बड़ा हिस्सा लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी का पारंपरिक समर्थक माना जाता है, जबकि शेष गैर-जाटव दलित मतदाताओं को लेकर लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति बनाते हैं।

इरफान जामियावाला ने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं में लगभग 80 से 85 प्रतिशत पसमांदा यानी ओबीसी और दलित मुसलमान हैं। यह वर्ग प्रदेश की कुल आबादी और मतदाताओं में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है, लेकिन इसके बावजूद सत्ता, संगठन, विधानमंडल और संसद में इन्हें उनकी आबादी और योगदान के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।

उन्होंने कहा कि प्रदेश की लगभग सभी प्रमुख पार्टियां भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अपना दल एस, राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दल पसमांदा समाज के समर्थन की बात तो करते हैं, लेकिन वास्तविक राजनीतिक भागीदारी अभी भी सीमित है।

इरफान जामियावाला ने कहा कि उत्तर प्रदेश का पसमांदा समाज केवल वोट बैंक बनकर नहीं रह सकता। जिस भी राजनीतिक दल चाहे वह भाजपा हो, सपा, बसपा, कांग्रेस, आरएलडी, अपना दल एस, एसबीएसपी या कोई अन्य दल हमारी आबादी और वोट के अनुपात में सत्ता, संगठन और टिकटों में सम्मानजनक हिस्सेदारी देगा, हमें बिना किसी पूर्वाग्रह के उसी के साथ खड़ा होना चाहिए। राजनीति में सम्मान और भागीदारी किसी एक दल की बपौती नहीं है, यह हमारे संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है।

उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि पसमांदा समाज केवल भावनात्मक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हितों को केंद्र में रखकर निर्णय ले।

इरफान जामियावाला का मानना है कि यदि उत्तर प्रदेश का पसमांदा समाज संगठित होकर अपने प्रतिनिधित्व के प्रश्न को मजबूती से उठाए तो प्रदेश की राजनीति में एक नया सामाजिक और लोकतांत्रिक विमर्श स्थापित हो सकता है।

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