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न्याय का धर्म एक होना चाहिए, पीड़ित की पहचान नहीं इरफान जामियावाला

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न्याय का धर्म एक होना चाहिए, पीड़ित की पहचान नहीं
इरफान जामियावाला

हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के ग्राम रहिमापुर में माननीय मंत्री लखेंद्र पासवान जी द्वारा मृतक संतोष पासवान के शोकाकुल परिवार से मिलना, संवेदना व्यक्त करना, ₹4,12,650 की प्रथम किस्त का चेक प्रदान करना, दूसरी किस्त का आश्वासन देना, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी तथा चारों बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करना निस्संदेह एक मानवीय और सराहनीय कदम है। साथ ही निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के निर्देश भी स्वागत योग्य हैं।
लेकिन इसी के साथ एक प्रश्न हमारे लोकतंत्र, हमारी संवैधानिक व्यवस्था और हमारी सामूहिक अंतरात्मा के सामने खड़ा होता है।
जब किसी दलित, महादलित या अन्य वंचित समुदाय के पीड़ित परिवार को सरकार तत्काल सहायता, नौकरी और बच्चों की शिक्षा का अधिकार देती है, तब यही संवेदनशीलता उन दलित मुसलमानों और पसमांदा मुसलमानों के परिवारों के प्रति क्यों नहीं दिखाई देती, जो मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा या जातीय उत्पीड़न का शिकार होते हैं?
क्या किसी इंसान की पीड़ा उसके धर्म के आधार पर अलग-अलग मापी जानी चाहिए?
क्या संविधान ने किसी नागरिक के जीवन का मूल्य उसके मजहब के अनुसार निर्धारित किया है?
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, न्याय और गरिमा का अधिकार देता है। यदि किसी निर्दोष की हत्या होती है, तो उसके परिवार को न्याय, मुआवजा, पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलना चाहिए—चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान, सिख, ईसाई या किसी भी धर्म का हो।
दुर्भाग्य से अनेक मामलों में देखा गया है कि जब पीड़ित दलित मुस्लिम या पसमांदा मुस्लिम होता है, तब सरकारी सहायता, पुनर्वास, नौकरी और बच्चों की शिक्षा जैसे मामलों में समान संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती। यही भेदभाव समाज में असंतोष और अविश्वास को जन्म देता है।
सरकारों का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि हर नागरिक के साथ बिना किसी धार्मिक या जातीय भेदभाव के न्याय करना भी है। न्याय का अर्थ तभी सार्थक होगा, जब वह सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो।
मैं, इरफान जामियावाला, बिहार सरकार से विनम्रतापूर्वक पूछना चाहता हूँ कि यदि किसी दलित या पसमांदा मुस्लिम परिवार का सदस्य लिंचिंग या हिंसा का शिकार होता है, तो उसके परिवार को भी वही सहायता राशि, सरकारी नौकरी, बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास की सुविधा क्यों नहीं दी जाती? क्या उनका दर्द कम है? क्या उनके बच्चों का भविष्य कम महत्वपूर्ण है?
आज आवश्यकता इस बात की है कि पीड़ित की जाति या धर्म नहीं, बल्कि उसकी पीड़ा को देखा जाए। न्याय की कसौटी समान होनी चाहिए। सरकार की संवेदना भी समान होनी चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह हर नागरिक को बराबरी का अधिकार और सम्मान देता है।
न्याय तभी पूर्ण होगा, जब वह बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक पीड़ित तक पहुँचे। यही संविधान की भावना है, यही मानवता का संदेश है और यही एक मजबूत, समरस और न्यायपूर्ण भारत की पहचान होनी चाहिए।
इरफान जामियावाला
लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पसमांदा चिंतक

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