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आख़िर 85% पसमांदा मुसलमानों को बाज़ार में बेच कौन रहा है? इरफान जामियावाला

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आख़िर 85% पसमांदा मुसलमानों को बाज़ार में बेच कौन रहा है? इरफान जामियावाला


इतिहास का सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि हमारे साथ अन्याय हुआ, बल्कि यह है कि कई बार हमें यह भी पता नहीं चला कि हमारे नाम पर फैसले कौन ले रहा था।
पाकिस्तान बना लेकिन करोड़ों आम मुसलमान, विशेषकर मेहनतकश, दस्तकार, बुनकर, नाई, धोबी, कुंजड़ा, हलालखोर, मनिहार, अंसारी और अन्य पसमांदा तबकों से कभी यह नहीं पूछा गया कि वे क्या चाहते हैं। इतिहास के बड़े फैसले कुछ राजनीतिक नेतृत्व ने किए, जबकि आम लोग उनके परिणामों के साथ जीते रहे।
आज भी एक सवाल बार-बार मन में उठता है—क्या हमारी आवाज़ कभी हमारी अपनी रही?
पसमांदा समाज का बड़ा हिस्सा सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से आज भी सबसे अधिक वंचित वर्गों में गिना जाता है। लंबे समय से यह भी बहस होती रही है कि दलित मुस्लिम समुदायों को अनुसूचित जाति का दर्जा क्यों नहीं मिला और इस विषय पर अनेक सामाजिक संगठनों, आयोगों तथा न्यायालयों में चर्चाएँ चलती रही हैं। लेकिन दुखद यह है कि इन मुद्दों पर सबसे अधिक प्रभावित लोगों की भागीदारी अक्सर सीमित रही है।
कल फिर मुसलमानों की एक बड़ी बैठक हुई। प्रेस विज्ञप्तियाँ आईं, बयान दिए गए, प्रतिनिधिमंडल बने। लेकिन देश के 85 प्रतिशत पसमांदा मुसलमानों को न उसकी जानकारी थी, न उनसे राय ली गई और न ही उनकी वास्तविक समस्याएँ उस चर्चा का केंद्र बनीं।
यदि किसी समुदाय के नाम पर बार-बार राजनीति होती रहे, लेकिन उसी समुदाय का बहुसंख्यक वर्ग निर्णय प्रक्रिया से बाहर रहे, तो यह लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व दोनों के लिए गंभीर प्रश्न है।
सवाल यह नहीं कि बैठक किसने बुलाई। सवाल यह है कि प्रतिनिधित्व किसका है?
क्या कुछ चेहरे पूरे समाज का ठेका लिए बैठे हैं? क्या मेहनतकश मुसलमानों की आवाज़ केवल चुनावी मौसम में याद आती है? क्या सामाजिक न्याय का अर्थ केवल भाषणों तक सीमित रह गया है?
पसमांदा मुसलमान अब दया नहीं, भागीदारी चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके नाम पर होने वाली हर बातचीत में उनकी वास्तविक उपस्थिति हो। उनके बच्चे शिक्षा पाएँ, युवाओं को रोज़गार मिले, दस्तकारों को सम्मान मिले और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित हो।
आज आवश्यकता किसी टकराव की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है। जो भी नेतृत्व पूरे मुस्लिम समाज की बात करता है, उसे यह बताना होगा कि पसमांदा समाज की आवाज़ उसके मंचों पर कहाँ है।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक व्यवस्था से सवाल है।
यदि 85 प्रतिशत लोग यह नहीं जानते कि उनके नाम पर कौन बोल रहा है, कौन बैठक कर रहा है और कौन उनके भविष्य के निर्णयों में भाग ले रहा है, तो लोकतांत्रिक समाज में यह आत्ममंथन का विषय अवश्य है।
अब समय आ गया है कि पसमांदा समाज स्वयं पढ़े, समझे, संगठित हो और अपनी आवाज़ स्वयं बने। क्योंकि इतिहास गवाह है जो समाज अपनी आवाज़ दूसरों के भरोसे छोड़ देता है, उसकी तकदीर भी दूसरे ही लिखते हैं।
सवाल अब भी वही है,
अगर 85 प्रतिशत पसमांदा मुसलमानों को कुछ पता ही नहीं, तो उनके नाम पर फैसले कौन कर रहा है? उनकी आवाज़ कौन बन रहा है? और उनकी नुमाइंदगी का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
इन सवालों के जवाब लोकतांत्रिक विमर्श, पारदर्शिता और वास्तविक प्रतिनिधित्व से ही मिल सकते हैं।
इरफान जामियावाला
लेखक, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता

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