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बिहार ने फिर दिखाया लोकतंत्र की ताक़त: जब जनता जागती है तो सत्ता को सुनना पड़ता है, इरफान जामियावाला

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बिहार ने फिर दिखाया लोकतंत्र की ताक़त: जब जनता जागती है तो सत्ता को सुनना पड़ता है, इरफान जामियावाला

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब बिहार की जनता जागती है, तो उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देती है। यह प्रदेश केवल राजनीतिक नेतृत्व देने वाला राज्य नहीं रहा, बल्कि जन आंदोलनों की वह धरती है जिसने कई बार राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने का काम किया है।
हाल के घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि किसी भी आंदोलन की असली ताक़त जनता की भागीदारी में होती है। जब तक आंदोलन सीमित दायरे में रहता है, उसका प्रभाव भी सीमित रहता है। लेकिन जैसे ही युवा, छात्र और आम नागरिक खुलकर सड़कों पर उतरते हैं, सरकारों को भी जनता की आवाज़ सुननी पड़ती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
बिहार का इतिहास ऐसे अनेक जन आंदोलनों से भरा पड़ा है। महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का निर्णायक मोड़ बना। जेपी आंदोलन ने आपातकाल के दौर में लोकतंत्र की रक्षा का बिगुल फूंका और पूरे देश में राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। समय-समय पर बिहार ने यह साबित किया है कि जब जनता संगठित होती है, तो सत्ता परिवर्तन ही नहीं, व्यवस्था परिवर्तन की मांग भी राष्ट्रीय विमर्श बन जाती है।
हालिया आंदोलन को लेकर भी यही चर्चा रही कि जब बिहार के छात्र और युवा बड़ी संख्या में आंदोलन से जुड़े, तब सरकार पर दबाव बढ़ा और उसे अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करना पड़ा। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक सिद्धांत है कि जनमत को अंततः महत्व देना पड़ता है।
अब समय है कि बिहार एक और सामाजिक न्याय के आंदोलन का नेतृत्व करे। यह आंदोलन पसमांदा (दलित एवं पिछड़े) मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों के लिए हो। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत 1950 के राष्ट्रपति आदेश में धर्म आधारित जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनके कारण मुस्लिम और ईसाई दलित समुदायों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिल पाता। इस विषय पर वर्षों से सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है तथा यह मामला न्यायालय और सार्वजनिक विमर्श का भी हिस्सा रहा है।
पसमांदा चिंतक इरफान जामियावाला का सुझाव है कि बिहार से एक व्यापक, लोकतांत्रिक और संवैधानिक आंदोलन शुरू किया जाए, जिसकी प्रमुख मांग यह हो कि अनुसूचित जाति के दर्जे पर धर्म आधारित प्रतिबंध समाप्त किए जाएं, ताकि सभी दलित समुदायों को समान संवैधानिक अधिकार मिल सकें। उनका मानना है कि सामाजिक न्याय का सिद्धांत तभी पूर्ण होगा जब समान सामाजिक और ऐतिहासिक वंचना झेलने वाले सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार किया जाए।
बिहार ने इतिहास में कई बार परिवर्तन की मशाल जलाई है। यदि भविष्य में भी कोई नया आंदोलन खड़ा होता है, तो उसकी सफलता लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से जनता की व्यापक भागीदारी पर ही निर्भर करेगी। यही बिहार की पहचान रही है और यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त भी है।
इरफान जामियावाला
पसमांदा चिंतक, लेखक, पत्रकार, बिहार

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