डॉ. राहत अली: जनसुराज ने बिहार की राजनीति में शुरू किया नया अध्याय
ऑल इंडिया जमीअतुर राईन के राष्ट्रीय संगठन महासचिव सह पसमंदा मुस्लिम समाज एवं बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के सामाजिक कार्यकर्ता *जनाब डॉ. राहत अली राईन साहब* ने कहा है कि *जनसुराज बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है*। प्रशांत किशोर के उभार से बिहार की राजनीति में मुद्दा आधारित राजनीति की ओर संभावित बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस में डॉ. राहत अली साहब ने कहा कि प्रशांत किशोर की बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता इस बात का संकेत है कि अब सुशासन, विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दे जाति, धर्म, परिवारवाद और पैसावाद आधारित पारंपरिक राजनीति पर प्राथमिकता प्राप्त कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि बिहार ने दशकों तक ऐसी चुनावी राजनीति देखी है जो मुख्यतः जातीय समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण और वंशवादी राजनीतिक संरचनाओं से प्रभावित रही है। यद्यपि इन कारणों ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया, लेकिन आम नागरिकों के जीवन से जुड़े मूलभूत मुद्दे अक्सर पीछे छूट गए।
उन्होंने कहा, बिहार का राजनीतिक विमर्श अब धीरे-धीरे परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है। विशेषकर युवा मतदाता अब ऐसी नेतृत्व क्षमता की अपेक्षा कर रहे हैं जो पारदर्शी शासन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और सतत आर्थिक विकास सुनिश्चित करे, न कि केवल जाति या धर्म के आधार पर समर्थन मांगे।
डॉ. राहत अली ने कहा कि यदि कोई नेता राजनीतिक विचारधारा या दलगत संबद्धता से ऊपर उठकर सार्वजनिक बहस को सुशासन, सार्वजनिक नीति और विकास की ओर मोड़ने में सफल होता है, तो इसे लोकतांत्रिक राजनीति के लिए सकारात्मक संकेत माना जाना चाहिए। प्रशांत किशोर के राजनीतिक उभार का महत्व केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने स्थापित राजनीतिक दलों को शासन, सार्वजनिक नीति और विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने के लिए प्रेरित किया है।
उन्होंने कहा कि बिहार की विशाल युवा आबादी अब राजनीतिक नेतृत्व का मूल्यांकन उसके प्रदर्शन और जवाबदेही के आधार पर कर रही है। आज की पीढ़ी की आकांक्षाएँ जातीय और धार्मिक पहचान से आगे बढ़ चुकी हैं। युवा अवसर, सम्मान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रभावी सुशासन चाहते हैं। जो राजनीतिक दल इस बदलती सोच को नहीं समझेंगे, वे धीरे-धीरे मतदाताओं से कट जाएंगे।
बिहार की राजनीति की भावी दिशा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य लोकतांत्रिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण मोड़ पर है। आने वाले वर्षों में परिवारवाद, पैसावाद, व्यक्तिपूजा और पहचान आधारित राजनीति का प्रभाव धीरे-धीरे कम होगा। भविष्य उन्हीं नेताओं का होगा जो स्पष्ट दृष्टि, प्रशासनिक क्षमता और जनता के प्रति जवाबदेही दिखाएंगे।
हालांकि उन्होंने कहा कि सार्थक राजनीतिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के भरोसे संभव नहीं है। कोई एक नेता अकेले बिहार का कायाकल्प नहीं कर सकता। बिहार का युवा वर्ग जिसे “जीएनजीए” कहते हैं – आधुनिक बिहार का बेरोजगार युवा छुआछूत और हिंदू-मुस्लिम नहीं समझता, उसे तो सिर्फ रोजगार और स्वास्थ्य चाहिए।
जब उसे रोजगार नहीं मिलता तो पढ़ा-लिखा लड़का प्रवासी पक्षी बनकर अन्य राज्यों में जाकर मेहनत-मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। आखिर बिहार में क्या नहीं है, फिर भी एक सुई की फैक्ट्री नहीं लग सकी, न लघु उद्योग और न बंद पड़ी मिल चालू हो सकी।
जब तक बिहार को जनप्रतिनिधियों द्वारा “बीमारू राज्य” बनाकर रखा जाएगा, तब तक न शिक्षा ठीक होगी और न स्वास्थ्य।
स्थायी प्रगति के लिए मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ, जागरूक नागरिक, जिम्मेदार राजनीतिक दल, पारदर्शी शासन और सक्रिय जनभागीदारी आवश्यक है। नेतृत्व परिवर्तन की शुरुआत कर सकता है, लेकिन उसे स्थायी बनाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अंत में उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ऐसी राजनीति की हकदार है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, औद्योगीकरण, कृषि सुधार, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और सुशासन पर केंद्रित हो। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब नागरिक वंशानुगत पहचान के बजाय प्रदर्शन, ईमानदारी और दूरदृष्टि के आधार पर मताधिकार का प्रयोग करें।

